Autobiography of Dalai Lama Full Hindi Audiobook


Full Autobiography of Dalai Lala in Hindi Hindi Audiobook
Holly Dalai Lala 14th

अपने लक्ष्य और जीवन मूल्यों के प्रति कठिन परिस्थियों में भी कैसे स्थिर रहा जाए? इस बारे में Freedom in Exile एक अद्भुत और आकर्षक audiobook है, जो एक ऐसे लीडर की Autobiography है, जिसे तिब्बत से निर्वासित कर दिया गया था, जो 1989 के नोबेल शांति पुरस्कार के विजेता था। इस audio book में hindi में यह बताया गया है कि तिब्बत के religious और secular head leader Dalai Lama के living reincarnation का क्या अर्थ है।


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इसके अलावा इसमें lhasa में Dalai Lama के बचपन और परवरिश की मनोरंजक stories के अलावा, वर्ष 1959 में तिब्बत पर चीनी आक्रमण और उसके बाद से तिब्बती शरणार्थियों की देखभाल करने और अहिंसा की नीति के माध्यम से इसमें विश्व शांति को बढ़ावा देने के वर्षों की चर्चा है। यह hindi audio book सुनने के बाद दलाई लामा जो एक दयालु व्यक्ति और आध्यात्मिक नेता है उनके प्रति हमारे मन में जबरदस्त सम्मान और प्रशंसा उटपन हो जानी स्वाभाविक है, यह बुक हमें बताती है कि जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आप कैसे खुश और समृद्ध हो सकते है।



Start Countdown to Escape


अगले नौ वर्षों तक दलाई लामा ने एक तरफ चीन के तिब्बत पर full scale military takeover से बचने की कोशिश की और दूसरी तरफ तिब्बती fighters में चीनी हमलावरों के खिलाफ बढ़ती नाराजगी को शांत किया। उन्होंने जुलाई 1954 से जून 1955 तक चीन की ऐतिहासिक यात्रा की और माओ त्से तुंग, चाउ एनलाई, झू तेह और देंग शियाओपिंग सहित अन्य चीनी नेताओं से मुलाकात की। नवंबर 1956 से मार्च 1957 तक वे 2500वें बुद्ध जयंती समारोह में भाग लेने के लिए भारत आए। जब युवा दलाई लामा 1958-59 की सर्दियों में उनके लोगों के खिलाफ बढ़ती क्रूरता की निराशाजनक खबरें आने लगीं थी।


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Dalai Lama’s Escape into Exile


10 मार्च 1959 आते आते communist china के General Zhang Chenwu ने तिब्बती leader को एक Chinese dance troupe के एक theatrical show को attend करने के लिए निमंत्रण दिया। इस invitation में जब नई conditions को जोड़ा गया कि दलाई लामा के साथ इस समारोह में कोई भी तिब्बती सैनिक नहीं रहेगा और उनके अंगरक्षक निहत्थे ही आएंगे, तो ल्हासा की जनता में एक तीव्र चिंता की लहर दौड़ गई। जल्द ही हजारों तिब्बतियों की भीड़ नोरबुलिंगका पैलेस के आसपास जमा हो गई, जो अपने young leader के जीवन पर किसी भी प्रकार के खतरे की आशंका के चलते दलाई लामा को जाने से रोक दिया।


दिनांक 17 मार्च 1959 को Nechung Oracle के consultation के दौरान पवित्र दलाई लामा को देश छोड़ने का स्पष्ट निर्देश दे दिया गया। Oracle के decision ने दलाई लामा की भविष्यवाणी को सच साबित कर दिया, भले ही इस समय सफलतापूर्वक यहाँ से निकलने की संभावना बहुत कम थी।


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शाम के लगभग दस बजे, दलाई लामा, एक सामान्य सैनिक के वेश में, एक छोटे से अनुरक्षक के साथ लोगों की भारी भीड़ को पार करते हुए Kyichu river की ओर बढ़े, जहाँ पर उनके साथ उनके बाकी दल के सदस्य भी शामिल हो गए, जिसमें उनके परिवार के भी कुछ सदस्य थे।


Lama’s life In Exile


Lhasa से निकालने के तीन सप्ताह बाद, 31 मार्च 1959 को, Dalai Lama और उनका दल भारतीय सीमा पर पहुँचे, जहाँ से Indian Guards द्वारा उन्हें Arunachal Pradesh के Bomdila town में ले जाया गया। भारत सरकार पहले ही Dalai Lama और उनके followers को शरण देने को सहमत हो गई थी। 20 अप्रैल 1959 को Mussoorie में पहुंचने के तुरंत बाद, Dalai Lama ने Indian Prime Minister से मुलाकात की और दोनों ने Tibetan refugees के rehabilitating के बारे में बात की।


Tibetan refugees के बच्चों के लिए मॉडर्न एजुकेशन के इम्पॉर्टन्स को समझते हुए, Dalai Lama ने नेहरू पर भारतीय शिक्षा मंत्रालय के अंदर तिब्बती शिक्षा के लिए एक विशेष खंड बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। जिससे भारत सरकार, तिब्बती बच्चों के लिए स्कूलों की स्थापना के लिए सभी खर्चों को वहन करने पर सहमत हो गई।


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दलाई लामा ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए 20 जून 1959 को एक press conference बुलाई, जिसमें उन्होंने औपचारिक रूप से Seventeen-Point Agreement को खारिज कर दिया। उन्होंने विभिन्न नए तिब्बती प्रशासनिक विभागों के निर्माण का निरीक्षण किया। इनमें सूचना, शिक्षा, गृह, सुरक्षा, धार्मिक मामले और आर्थिक मामलों के विभाग शामिल थे। अधिकांश तिब्बती शरणार्थी, जिनकी संख्या लगभग 30,000 हो गई थी, को उत्तरी भारत की पहाड़ियों में सड़क निर्माण शिविरों में बसाया गया।


10 मार्च 1960 को Central Tibetan Administration के लगभग 80 officers के साथ धर्मशाला जाने से ठीक पहले, दलाई लामा ने “Tibetan People’s Uprising” की पहली वर्षगांठ पर एक वक्तव्य दिया। जिसमें उन्होंने अपने लोगों को तिब्बत की स्थिति के बारे में दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। जो निर्वासन में हैं, उनकी प्राथमिकता पुनर्वास और हमारी सांस्कृतिक परंपराओं की निरंतरता होनी चाहिए। जहां तक भविष्य का प्रश्न है, सत्य, न्याय और साहस के साथ तिब्बती अंततः तिब्बत की स्वतंत्रता प्राप्त करने में विजयी होंगे।


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