Atomic Habit in Hindi Audio Book Introduction

Atomic Habit in Hindi Audiobook

Atomic Habit - Introduction

आज हम संसार भर में मशहूर बुक एटॉमिक हैबिट के बारे में बात कर रहे है जिसे जेम्स क्लियर ने लिखा है. यह हमें सिखाती है कि मानव कैसे अपनी आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करके जीवन में मनचाहे अद्भुत परिणाम हासिल कर सकता है.

लेखक पुस्तक कि शुरुआत अपने बचपन के व्यक्तिगत अनुभवों से करते हुए अपने four-step विचार को 6 पार्ट्स के माध्यम से 20 चैप्टर्स में बहुत विस्तार से समझाते है.

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लेखक यानि कि जेम्स क्लियर लिखते है कि हाई स्कूल के उनके दुसरे वर्ष के अंतिम दिन, जब वे अपने दोस्तों के साथ बेसबॉल खेल रहे थे, तभी अचानक से बॉल को हिट करने के लिए उनके दोस्त ने बल्ला जब जोर से घुमाया तो वह उसके हाथों से फिसल गया और लेखक की आंखों के बीच में नाक पर लगा। वो लिखते है कि जब बल्ला उनकी नाक पर लगा था उस क्षण के प्रभाव उन्हें आज भी याद नहीं आते कि आखिर अचानक से हुआ क्या था।

बल्ला उनके चेहरे पर इतनी ताकत से लगा कि उसकी चोट से नाक बुरी तरह से विकृत हो गया था। यह चोट इतनी जबर्दस्त थी कि लेखक का माथा, खोपड़ी के अंदर धंस गया। इसे याद करते हुए उन्होंने लिखा है कि तुरंत, ही एक सुजन की लहर पूरे सिर में आ गई थी। उनके अनुसार एक क्षण वे बिलकुल ठीक थे व अगले ही पल लगभग सेकंड के हजारवें भाग से भी कम समय के बाद उनकी नाक टूटी हुई थी, खोपड़ी में फ्रैक्चर था और चकनाचूर हुई दोनों आँखों के चारों तरफ की हड्डियाँ थी।

जब लेखक ने अपनी आँखें खोलीं, तो देखा कि लोग उन्हें घूर रहे थे व मदद के लिए भागदौड़ कर रहे थे। जब लेखक ने नीचे देखा तो अपने कपड़ों पर लाल रंग के धब्बे देखे। उनके सहपाठियों में से किसी एक ने अपनी शर्ट उतारकर लेखक को दे दी जिससे उसने अपनी जख्मी हुई जगह से निकलने वाले खून को रोकने के लिए लगा लिया। वो इस बात से हैरान, भ्रमित व अनजान थे कि वो कितना गंभीर घायल हो गये थे।

ग्राउंड में उपस्थित लेखक के शिक्षकों ने उसे कंधे के चारों ओर अपनी बांह से पकड़ा और नर्सिंग होम के लिए चलना शुरू किया, जो काफी दुरी पर पहाड़ी के निचे स्कूल में स्थित था. बहुत ही इमानदारी से बेतरतीब हाथों से लेखक को पकड़े हुए सभी ने धीरे-धीरे चलना शुरू किया। इस दौरान किसी को भी इसका एहसास नहीं हुआ कि हर मिनट कितना मायने रखता है।

जब वे नर्सिंग होम पहुंचे, तो नर्स ने लेखक से उनकी वर्तमान स्थिति जानने के लिए कुछ सवाल पूछे -

"अभी कौनसा साल चल रहा है?"

"लेखक ने जवाब दिया 1998," लेकिन यह वास्तव में 2002 था।

उन्होंने दूसरा सवाल पूछा "संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति कौन हैं?"

लेखक ने फिर जवाब दिया "बिल क्लिंटन,"। लेकिन इसका सही उत्तर था जॉर्ज डब्ल्यू बुश।

फिर तीसरा सवाल पूछा "आपकी माँ का नाम क्या है?"

"उह। उम। " लेखक रुक गए, दस सेकंड बीत गए।

फिर लेखक ने लापरवाही से कहा "पट्टी," इसे अनदेखा करते हुए कि उन्हें अपनी माँ का नाम याद करने के लिए दस सेकंड लग गए था.

आखिरी सवाल का जवाब देने में लेखक असमर्थ थे.

मस्तिष्क में तेजी से सूजन बढ़ रही थी जिसके चलते एंबुलेंस तक पहुंचने से पहले ही लेखक ने अपनी चेतना खो दी और वे बेहोश हो गए। कुछ ही मिनट बाद, वहां से उन्हें स्थानीय अस्पताल में रेफैर कर दिया गया।

अस्पताल में पहुंचने के कुछ ही समय बाद, उनका शरीर शिथिल होने लगा। उनका शरीर कुछ निगलने व सांस लेने जैसे बुनियादी कार्यों के लिए भी बहुत संघर्ष कर रहा था। उन्हें इसी दौरान पहला मस्तिष्क दौरा पड़ा और फिर उनके शरीर ने पूरी तरह से सांस लेना बंद कर दिया। स्थिति को अनियंत्रित होते देख डॉक्टरों ने ऑक्सीजन लगाई और जल्दबाजी में, आदेश दिया कि मरीज को एयर-टैक्सी के द्वारा सिनसिनाटी के एक बड़े अस्पताल में तुरंत रेफेर किया जाए।

जब उन्हें इमरजेंसी वार्ड से बाहर निकाल कर हेलीपैड तक ले जाया जा रहा था तभी स्ट्रेचर ऊबड़-खाबड़ फुटपाथ पर टूट गया. तभी एक नर्स ने उन्हें सम्भाला, जबकि दूसरी ने अपने हाथ से ब्रीदिंग की प्रक्रिया जारी रखी। मरीज की मां, जो कुछ ही समय पहले अस्पताल पहुंची थीं, हेलिकॉप्टर में उनके बगल में बैठ गयी। उड़ान के दौरान लेखक बेहोश, सांस लेने में असमर्थ थे. उनकी माँ पुरे रस्ते उनका हाथ अपने हाथ में पकड़े हुए बैठी रहीं।

जब उनकी माँ हेलीकॉप्टर में उनके साथ सवार हुई, तब उनके पिता ने घर पर पहुँच कर उनके भाई और बहन को इस एक्सीडेंट का समाचार दिया। यह समाचार सुनते ही दोनों रोने लगे, तब उन्होंने अपनी बेटी को समझाते हुए आंसू पोछे. इसके बाद दोनों बच्चों को रिश्तेदारों के पास छोड़कर वे सिनसिनाटी के लिए रवाना हो गए।

जब लेखक की माँ और लेखक अस्पताल की छत पर उतरे, तो लगभग बीस डॉक्टरों और नर्सों की एक टीम ने हेलीपैड से स्ट्रेचर पर मरीज को ट्रोमा यूनिट के में पहुँचाया। इस समय तक, दिमाग की सूजन इतनी गंभीर हो गयी कि उन्हें बार-बार पोस्टट्रॉमेटिक का दौरा पड़ना शुरू हो चूका था। उनकी टूटी हुई नाक कि हड्डियों को ठीक करने की जरूरत थी, लेकिन उनकी हालत ऐसी नहीं थी कि वे अभी एक और सर्जरी को झेल पायें। एक और दौरे के बाद दिन का तीसरा पहर निकल चूका था. फिर उन्हें मेडीकली इंडयुसड कोमा में वेंटिलेटर पर रखा गया।

लेखक के माता-पिता के लिए यह अस्पताल अनजान नहीं था। दस साल पहले, वे इस के बाद वाले ग्राउंड फ्लोर पर उसी बिल्डिंग में तब रहे थे जब उन्हें पता चला कि उनकी बेटी को तीन साल की उम्र में ल्यूकेमिया था। उस समय लेखक की उम्र पाँच साल व उनके भाई की उस समय उम्र मात्र छह महीने थी। और अंततः ढाई साल बाद कीमोथेरेपी, स्पाइनल Taps और bonn marrow बायोप्सी, होने की बाद उनकी बहन अंत में खुश, स्वस्थ, और कैंसर मुक्त होकर अपने पैरों पर चलकर घर गयी। और अब, नार्मल जीवन के दस साल बाद, लेखक के माता-पिता उसी स्थान पर अपने दुसरे बच्चे के साथ थे।

लेखक के कोमा में जाने के बाद, अस्पताल ने एक पादरी और एक सामाजिक कार्यकर्ता को उनके माता-पिता के पास सांत्वना देने के लिए भेजा। यह वही पादरी थे जो एक दशक पहले एक शाम को लेखक के पिता को तब मिले थे जब उन्हें अपनी बेटी के कैंसर होने का पता चला था।

जैसे-जैसे दिन ढलता गया, वैसे वैसे लेखक का जीवन मशीनों पर आश्रित होता चला गया। उनके माता-पिता अस्पताल के गद्दे पर सोते थे – कभी कभी लगता था कि वे थकान से गिर जायेंगे, लेकिन  अगले ही पल वे चिंतित से जागृत हो जाते। उनकी माँ ने उन्हें बाद में बताया, “ कि उस समय, सबसे बुरी रातें उनके पास थीं।"

लेखक का ठीक होना

दया भाव के साथ, डॉक्टर्स ने उन्हें कोमा से बाहर भेजने के लिए तब राजी हुए जब अगली सुबह तक लेखक की साँसे बेहोशी के बाद नार्मल चलने लगेंगी. जब उन्हें आखिरकार होश आया तो पाया कि वे अपनी सूंघने की क्षमता खो चुके थे। कुछ टेस्टों के बाद एक नर्स ने उन्हें कहा कि इस सेब को सूँघो, अब उनकी सूंघने की क्षमता लौट आई, लेकिन हर किसी को तब आश्चर्य हुआ जब नाक से हवा बाहर निकलने की बजाए, आंख के फ्रैक्चर वाली जगह से निकलने लगी व बाईं आंख को धक्का देकर आईबॉल को बाहर निकाल दिया. इसका कारण यह रहा की पलक और ऑप्टिक तंत्रिका द्वारा आंख को मस्तिष्क से जोड़ा नहीं गया था।

जब इस बारे में नेत्र रोग विशेषज्ञ ने जांच की तो उन्होंने कहा कि हवा जैसे-जैसे बाहर निकलेगी वसे-वैसे ही आंख धीरे-धीरे वापस अंदर जायेगी, साथ ही साथ उन्होंने यह भी कहा कि यह बताना कठिन है कि इसमें कितना समय लगेगा। उन्हें एक सप्ताह बाद सर्जरी के लिए दुबारा अपोइन्ट किया गया। लेखक को हस्पताल से छुट्टी के समय ऐसा महसूस हो रहा था जब लेखक अपनी टूटी हुई नाक, आधा दर्जन चेहरे पर फ्रैक्चर, और एक उभरी हुई आंख लेकर घर पर पहुंचे थे, जैसे वे अपना चेहरा किसी बॉक्सिंग मैच में तुड़वाकर आये हों.

आने वाले अगले महीने कठिन थे। ऐसा लगा जैसे जीवन में सब कुछ ठहर सा गया था। हफ्तों तक उन्हें हर चीज डबल दिखाई देती रही; वे सचमुच सीधे नहीं देख सकते थे, उनके विजन में काफी दिक्कत थी। इसमें एक महीने से अधिक समय लगा, लेकिन आँखों की रोशनी आखिरकार वापिस आ गई थी। आठ महीने बाद लेखक एक बार फिर से कार चला सकते थे। वे बार बार यह संकल्प लेते थे कि चोट को कभी वे अपने ऊपर हावी नहीं होने देंगे. लेकिन कुछ क्षणों बाद वे उदास महसूस करने लगते थे।

वे इस बात को यह करके दुखी हो जाते थे कि उन्हें बेसबाल मैदान से लगभग एक साल तह दूर रहना पड़ा। बेसबॉल हमेशा उनके जीवन का प्रमुख हिस्सा रहा था। उनके पिताजी ने भी कभी सेंट लुइस कार्डिनल्स जनरल लीग बेसबॉल मैच खेला था, व लेखक का भी यह सपना था की वे एक प्रोफेशनल खिलाड़ी के रूप में नाम कमाए। पुनर्वास के महीनों बाद, उनकी सबसे बड़ी इच्छा मैदान पर दोबारा जाकर खेलना थी।

लेकिन बेसबॉल में वापसी इतनी आसान नहीं थी। जबकि उन्हें सीजन के बीच से एक बार निकाला जा चुका हो, वे उस समय टीम के एकमात्र ऐसे खिलाड़ी थे जिसे बेसबॉल टीम से हटा दिया गया था। वे आगे लिखते है कि वे चार साल की उम्र से खेल रहे थे, जिसने भी किसी खेल में इतना समय और मेहनत खर्च की हो, उसे अचानक से टीम से हटना बेहद अपमानजनक महसूस होता है। उन्हें वह याद है जब यह सब हुआ था। वे निकाले जाने के बाद अपनी कार में बैठे-बैठे घंटों रोते रहे।

एक साल तक के सेल्फ-डाउट के बाद, वर्सिटी टीम में सीनियर जगह पाने में कामयाब रहे, लेकिन उन्होंने शायद ही कभी इसे मैदान पर खेला हो। कुल मिलाकर, वे हाई स्कूल वार्सिटी बेसबॉल की ग्यारह इनिंग खेल चुके हो, वो भी बिना एक गेम खेले।

हाई स्कूल के कैरियर के बावजूद, उन्हें अभी भी विश्वास था कि वे कर सकते है और एक महान खिलाड़ी बन सकते है। उन्हें पता था कि उन्हें ही चीजें ठीक करनी पड़ेगी, क्योकि इस सब के लिए वे खुद ही जिम्मेदार थे। चोट के दो साल बाद, जब डेनिसन यूनिवर्सिटी में कॉलेज जाना शुरू किया जो एक नई शुरुआत थी, यह वह जगह थी जहाँ उन्हें छोटी आदतों की आश्चर्यजनक शक्ति की खोज करने की पहली बार प्रेरणा मिली।

आदतों के बारे में कैसे सिखा

उनका मानना है कि डेनिसन यूनिवर्सिटी में भाग लेना उनके जीवन का सबसे अच्छा निर्णय था। उन्होंने शुरुआत से शुरू करके बेसबॉल टीम में एक महत्वपूर्ण स्पॉट हासिल किया, जिससे वे काफी रोमांचित थे। उनकी हाई स्कूल कि उद्दंडता के बावजूद वे एक कॉलेज एथलीट बनने में कामयाब रहे।

उन्होंने इस दौरान बेसबॉल टीम पर ही नहीं, बल्कि अपने जीवन क्रम पर भी ध्यान केंद्रित किया। जबकि उनके साथी देर रात तक जागकर वीडियो गेम खेलते रहते थे, इसके बावजूद उन्होंने अच्छी नींद की आदत बनाईं और हर रात जल्दी सोने की आदत डाली। कॉलेज छात्रावास की गन्दी दुनिया के बीच उन्होंने एक यह आदत भी बनाई कि वे अपने कमरे को साफ सुथरा रखेंगे। ये सुधार बहुत छोटे थे, लेकिन इन आदतों ने उन्हें अपने जीवन पर नियंत्रण की भावना दी। इससे उन्हें आत्मविश्वास की भावना महसूस हुई और अपने आप में बढ़ते विश्वास से अपनी अध्ययन की आदतों में सुधार किया व कालेज के साथ साथ कमाई करने में भी कामयाब रहे.

आदत एक दिनचर्या या व्यवहार है जिसे नियमित रूप से किया जाता है - और, कई मामलों में, इसे ऑटोमेटिक तरीके से भी। उनके द्वारा छोटी, सुसंगत व सही आदतों को अपनाने से प्रत्येक सेमेस्टर में वे पास होने के साथ साथ बाकी के कामों में भी इसके परिणाम उनके लिए अकल्पनीय थे। उदाहरण के लिए, उन्होंने जीवन में पहली बार, से लेकर कई बार वजन उठाने की आदत बना ली जिसे वे लगातार एक सप्ताह तक व बाद में इसे अपने जीवन का एक स्थाई हिस्सा बना लिया।

जब उनका सीफोरम सीजन आया, तो उन्होंने पिचिंग स्टाफ का शुरुआती रोल निभाया। सीजन के अंत तक आते आते उन्हें टीम के कप्तान व ऑल-कॉन्फ्रेंस टीम के लिए भी चुना गया था। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने इसका भुगतान नींद, अध्ययन, और ट्रेनिंग की आदतों में बदलाव के रूप में करना शुरू कर दिया।

छह साल बाद जब एक बेसबॉल बैट से चेहरे पर चोट के कारण अस्पताल में कोमा में रखा गया, तब उन्हें टॉप के रूप में चुना गया. उन्हें डेनिसन यूनिवर्सिटी में मेल एथलीट और ESPN के ईनाम से सम्मानित किया गया जो केवल अकादमिक ऑल-अमेरिका, देशभर में से टीम के सिर्फ तैंतीस खिलाड़ियों को ही दिया गया सम्मान था। वे ग्रेजुएशन तक इस सूचि में सूचीबद्ध थे। उसी वर्ष, उन्हें यूनिवर्सिटी के सर्वोच्च शैक्षणिक सम्मान राष्ट्रपति का पदक से सम्मानित किया गया था।

वे आगे लिखते है कि आशा है कि अगर आपको यह ओवर लगा हो तो आप उन्हें क्षमा कर देंगे। सही में, एथलेटिक करियर के बारे में कुछ भी पौराणिक या ऐतिहासिक नहीं था। उन्होंने आगे कहा कि उन्हें यह महसूस होता है कि कभी भी वे पेशेवर तरीके से नहीं खेले। हालाँकि, पीछे मुड़कर देखने से उन वर्षों में, उनका मानना है कि उन्होंने कुछ दुर्लभ पाया है: उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार सब किया। लेखक को यह पूरा विश्वास है कि इस पुस्तक में बताई गयी अवधारणाएं आपको आपकी क्षमता तक पहुँचाने में अवश्य मदद करेगी।

हम सभी जीवन में चुनौतियों का सामना करते हैं। इस चोट के  अनुभव ने एक महत्वपूर्ण सबक यह सिखाया है: कि छोटे-छोटे परिवर्तन जो छोटे व महत्वहीन लगते हैं उनकी सामूहिक शक्ति चक्रवर्ती दर से आपको आने वाले समय में उल्लेखनीय परिणाम देंगी। हम सभी जीवन में अक्सर असफलताओं से निपटते हैं लेकिन लंबे समय में, हमारे जीवन की गुणवत्ता अक्सर हमारी आदतों कि गुणवत्ता पर निर्भर करती है। उन्हीं समान आदतों से आप वैसे ही समान परिणाम पाओगे। लेकिन आदतों को बेहतर  करके कुछ भी पाना संभव हो जाता है।

यहाँ पर ऐसे लोग हैं जो रात भर में अविश्वसनीय सफलता प्राप्त कर सकते है। लेखक कहते है कि वे उनमें से किसी को भी नहीं जानते, और निश्चित रूप से इसमें वे खुद भी शामिल है। आगे लिखते है कि उनकी चोट के बाद कोमा की यात्रा का कोई एक परिभाषित समय नहीं था , जबकि वहां पर उनके आस पास  अनेकों लोग थे। यह एक क्रमिक विकास था, जिसमें छोटी-छोटी जीत की लंबी श्रृंखला और छोटी-छोटी सफलताएँ जुड़ी थी। वहां पर उनके लिए प्रगति का एकमात्र तरीका व एकमात्र विकल्प यह था – कि केवल छोटे से शुरू करना। उन्होंने इसी रणनीति को अपनाकर अपना खुद का बिज़नस शुरू किया व बाद में इस किताब कि शुरुआत भी।

इस पुस्तक को कैसे और क्यों लिखा गया

जेम्स ने नवंबर 2012 में, jamesclear.com पर लेख लिखने शुरू किये। वर्षों से, वे आदतों के बारे में अपने व्यक्तिगत प्रयोगों पर नोट्स बना रहे थे। उन्होंने हर सोमवार और गुरुवार को एक नया लेख प्रकाशित करके इसे शुरू किया। कुछ महीनों के भीतर, इस सरल लेखन की आदत से उनके साथ एक हजार ईमेल सब्सक्राइबर जुड़े, और 2013 के अंत तक यह संख्या तीस हजार से ज्यादा हो गयी।

2014 में, उनकी ईमेल लिस्ट एक लाख से अधिक सब्सक्राइबरस की हो गई, जिसने इसे इन्टरनेट पर सबसे तेजी से बढ़ते न्यूज़लेटर्स में से एक बनाया। उनका कहना है कि जब उन्होंने दो साल पहले लिखना शुरू किया था तब उन्हें बहुत ही असहज महसूस हुआ, लेकिन अब वे आदतों पर एक विशेषज्ञ के रूप में जाने जाने लगे — यह एक नया लेबल था जिसने उन्हें उत्साहित किया लेकिन साथ ही वे असहज भी महसूस कर रहे थे। वे आगे लिखते है कि उन्होंने कभी भी अपने आप को इस सब्जेक्ट का मास्टर नहीं माना, लेकिन कोई तो था जो उनके पाठकों के साथ प्रयोग कर रहा था।

2015 में, वे दो लाख ईमेल सब्सक्राइबर्स तक पहुँच गये और अपना स्वतंत्र लेखन का कार्य शुरू करने के लिए पेंगुइन रैंडम हाउस के साथ एक पुस्तक लिखने के समझौते पर हस्ताक्षर किए. जिसे आप अभी सुन रहे हैं। जैसे-जैसे उनके रीडर्स बढ़ते गए, वैसे-वैसे उनके पास बिज़नस के अवसर बढ़ते गए। उन्हें अब टॉप कंपनीया साईंस ऑफ़ हैबिट फार्मेशन, बिहेवियर चेंज व लगातार बदलाव आदि विषयों पर बोलने के लिए बुलाने लगी थी। साथ ही वे अब संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में आयोजित होने वाले सम्मेलनों में भाषण के माध्यम से कीनोट डिलीवर कर रहे थे।

2016 में, उनके लेख टाइम, एंटरप्रेन्योर और फोर्ब्स आदि में नियमित रूप से छपने लगे। अविश्वसनीय रूप से, उस साल उन्हें आठ मिलियन से अधिक लोगों द्वारा पढ़ा गया। साथ ही कोच व स्पीकर्स उनके द्वारा किये गए लेखन कार्यों के बारे में NFL, NBA और MLB में पढ़ना और अपनी टीमों से  साथ शेयर करना शुरू कर दिया था।

2017 की शुरुआत में, उन्होंने हैबिट्स अकादमी शुरू की, जिसे संस्थानों व व्यक्तिगत दोनों स्तर पर लोगों ने जीवन व कार्य में बेहतर आदतों के निर्माण का एक प्रमुख प्रशिक्षण मंच माना।

अब फॉर्च्यून 500 कंपनियों और बढ़ते स्टार्ट-अप ने अपने लीडर्स व कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने के लिए अपना नामांकन करना शुरू कर दिया. जहाँ से कुल मिलाकर, दस हजार से अधिक लीडर्स, प्रबंधकों, कोचों और शिक्षकों ने स्नातक किया है. अकादमी, और उनके साथ काम ने लेखक को सिखाया कि वास्तविक दुनिया में काम करने के लिए आदतों में छोटे बदलावों से क्या हो सकता है।

जैसे ही लेखक ने इस पुस्तक को 2018 में फिनिशिंग टच दिया, तब तक jamesclear.com हर महीने लाखों लोग साप्ताहिक लगभग पाँच लाख लोग ईमेल से सदस्यता ले रहे थे. यह सब लेखक के अनुसार उनकी अपेक्षाओं से परे है।

यह पुस्तक आपके लिए कैसे लाभदायक है

उद्यमी और निवेशक नवल रविकांत ने कहा है, “एक महान पुस्तक लिखने के लिए, आपको सबसे पहले खुद को एक पुस्तक बनना होता है।”  लेखक ने आगे लिखा है कि उन्होंने पुस्तक में बताये गए अपने अनुभावों व छोटे बदलावों को मूल रूप से सीखा है उनके साथ वे जीए है जिससे वे एक लेखक, एक बिज़नसमेन बने व एक सफल बिज़नस विकसित किया है। छोटी आदतों ने उन्हें उनकी पूरी क्षमता तक पहुँचने में मदद की है। यह पुस्तक जो अभी आपके हाथ में है यह आपके लिए भी उतना ही काम करेगी, आपको आपकी पूरी क्षमता तक पहुँचाने में मददगार साबित होगी.

आप जैसे – जैसे इसे पढ़ते/ सुनते जायेंगे आप चरणबद तरीके से इसके चैप्टर पायेंगे. जिसमें केवल दिनों या हफ्तों के लिए योजना नहीं है, बल्कि जीवन भर के लिए है। विज्ञान भी लेखक  द्वारा लिखी गई हर चीज का समर्थन करता है, यह पुस्तक ही नहीं है बल्कि एक  शैक्षणिक शोध पत्र; या कहें यह एक ऑपरेटिंग मैनुअल है, जिससे आप जान पाएंगे कि कैसे ज्ञान को व्यावहारिक व आसान तरीके से अपनी आदतों को बनाने और बदलने के लिए लागू करें।

इस पुस्तक में जिन क्षेत्रों को छुआ है वे बायोलॉजी, न्यूरो साइंस, फिलोसोफी, साइकोलॉजी, और भी कई विषय है जिन्हें इसमें छुआ गया है जिन्हें लेखक ने कई वर्षों से समझा व जाना हैं। इसमें सबसे अच्छे विचारों का विश्लेष्ण है जिसे स्मार्ट लोगों ने बहुत समय पहले खोजा है व साथ ही साथ वैज्ञानिकों ने हाल ही में भी जिन पर शोध किया है। लेखक का उन विचारों को खोजने में सबसे ज्यादा योगदान माना जायेगा जो सबसे ज्यादा मायने रखते है व जो एक्शनेबल भी है। लेखक आगे लिखते है कि इस पुस्तक में जो सर्वश्रेष्ठ है उसका श्रेय उन विशेषज्ञों को दिया जाना चाहिए जिन्होंने अपना समय लगाकर उन सिधान्तो को खोजा व कायम किया है, व कुछ भी अटपटा या काम न करने वाले विचार लगे वे मेरे है।

इस पुस्तक की बैकबॉन लेखक की आदतों का फोर स्टेप मॉडल है — क्यू, लालसा, प्रतिक्रिया, और इनाम- व व्यवहार के वे चार कानून जिनसे ये फोर-स्टेप विकसित होने वाले है। साइकोलॉजी पृष्ठभूमि वाले श्रोता इन्हें पहचान सकते है जैसे कंडीशनिंग, जिसे पहले 1930 के दशक में बी. ऍफ़. स्किनर के द्वारा "प्रोत्साहन, प्रतिक्रिया" के रूप में प्रस्तावित किया गया था, व इसे "पॉवर ऑफ़ हैबिट" पुस्तक में हाल ही में "क्यू, रूटीन, रिवार्ड" के रूप में चार्ल्स डुहिग ने सम्पादित किया था।

स्किनर जैसे व्यवहार वैज्ञानिकों ने कहा कि अगर आपने सही इनाम या सज़ा कि पेशकश की तो, आप लोगों को एक निश्चित कार्य करने के लिए सही मार्ग चुनने में मदद कर सकते है।  स्किनर मॉडल ने यह समझाने का उत्कृष्ट कार्य किया कि बाहरी उत्तेजनाओं ने हमारी आदतों को कैसे प्रभावित किया, इसमें एक अच्छी कमी यह थी कि हमारे विचारों, भावनाओं और विश्वासों का प्रभाव हमारे व्यवहार पर पड़ता है। हमारे मूड और भावनाओं जैसे आंतरिक मामलों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है. हाल के दशकों में, वैज्ञानिकों ने हमारे विचारों, भावनाओं और व्यवहार के बीच कनेक्शन खोजना शुरू कर दिया है ।

कुल मिलाकर, इस पुस्तक में लेखक द्वारा प्रस्तुत फ्रेमवर्क एक संज्ञानात्मक और व्यवहार विज्ञान का एकीकृत मॉडल है। लेखक का मानना है कि यह मानव व्यवहार का नया व अकेला मॉडल है. हमारी आदतों पर बाहरी उत्तेजनाओं और आंतरिक भावनाओं का प्रभाव दोनों मॉडलों के हिसाब से सटीक बैठता हैं। हालाँकि धारणाओं में कुछ समानताएं हो सकती है लेकिन लेखक को पूरा विश्वास है कि व्यवहार परिवर्तन के चार नियमों के प्रयोग- अपनी आदतों के बारे में सोचने का एक नया तरीका प्रदान करेगा।

मानव व्यवहार हमेशा एक स्थिति से दूसरी स्थिति, व पल-पल, बदल रहा है। लेकिन यह किताब मानव व्यवहार के उन मूल सिधान्तों के बारे में है जो स्थायी है जिन पर आप साल दर साल भरोसा कर सकते हैं। आप इन विचारों से अपने चारों और एक बिज़नस, एक परिवार, ओर एक जीवन बना सकते है।

बेहतर आदतें बनाने का कोई एक सही तरीका नहीं है, लेकिन यह किताब आपको इसका सबसे अच्छा तरीका बताएगी - एक दृष्टिकोण जो इस बात की परवाह किए बिना प्रभावी होगा, कि आप कहाँ से शुरू करते हैं या आप क्या बदलने की कोशिश कर रहे हैं। लेखक जिन रणनीतियों को कवर करते है वे, किसी भी व्यक्ति के लिए प्रासंगिक होंगे जो चरणबद तरीके से सुधार कि प्रणाली अपनाकर फिर चाहे उसका लक्ष्य स्वास्थ्य, पैसा, उत्पादकता, रिश्ते, या उपरोक्त सभी हो। जब तक इन मामलों में मानव व्यवहार शामिल रहेगा, यह पुस्तक आपका मार्गदर्शन करती रहेगी।

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